
भारत में एक व्यापक चिंता का विषय यह है कि जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण का मिला-जुला असर देश के प्राकृतिक संसाधनों और मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। जमीनी स्तर पर बढ़ता ओजोन प्रदूषण, विशेष रूप से गर्मियों के दौरान, एक अदृश्य खतरा है जो श्वसन संबंधी बीमारियों को बढ़ा रहा है और फसलों को नुकसान पहुंचा रहा है। वहीं, उत्तर भारत में प्रदूषण के कारण अब प्राकृतिक कोहरे की जगह धूम्र कोहरे (स्मॉग) ने ले ली है, जिससे विजिबिलिटी कम हो गई है और वायु गुणवत्ता ‘गंभीर’ श्रेणी में बनी हुई है।
ये स्थानीय पर्यावरणीय चुनौतियां, तेजी से पिघलते हिमालयी ग्लेशियरों के दीर्घकालिक खतरे से जुड़ जाती हैं, जो भविष्य में जल संकट और विनाशकारी हिमनद झील बाढ़ (GLOF) का कारण बन सकती हैं। इन खतरों से निपटने के लिए दिल्ली जैसे शहरों में कृत्रिम बारिश (क्लाउड सीडिंग) जैसे तकनीकी उपाय अपनाए जा रहे हैं, जिसका उद्देश्य तात्कालिक रूप से जहरीले प्रदूषक कणों को धोकर वायु गुणवत्ता में सुधार लाना है। ये सभी घटनाएं एक साथ यह दर्शाती हैं कि देश को अब न केवल प्रदूषण के स्थानीय स्रोतों, बल्कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी संबोधित करने के लिए व्यापक और तत्काल रणनीतियों की आवश्यकता है।



