
नई दिल्ली: सबरीमाला मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आस्था से जुड़े मामलों में निर्णय लेना बेहद जटिल है। अदालत ने धार्मिक परंपराओं और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन पर चर्चा की। यह मामला 2018 के उस फैसले से संबंधित है, जिसमें सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी और जिस पर पुनर्विचार याचिकाएं लंबित हैं।
सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि आस्था से जुड़े मामलों में निष्कर्ष निकालना न्यायालय के लिए एक जटिल और संवेदनशील विषय है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती लाखों लोगों की धार्मिक आस्था को चुनौती देना है।
सुनवाई के दौरान त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि किसी धर्म के भीतर अलग-अलग संप्रदायों की अपनी परंपराएं हो सकती हैं और उन्हें पूरे धर्म का अनिवार्य धार्मिक अभ्यास मानकर समीक्षा करना आवश्यक नहीं है।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश ने सवाल उठाया कि क्या अदालतें लाखों लोगों की राय सुने बिना सबरीमाला जैसे मामलों पर निर्णय दे सकती थीं। वहीं, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने टिप्पणी की कि सामाजिक सुधार के नाम पर ऐसे बदलाव नहीं किए जा सकते जो किसी धर्म को कमजोर या खोखला कर दें।
गौरतलब है कि 9 जजों की संविधान पीठ धार्मिक स्वतंत्रता और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई कर रही है। यह मामला 2018 के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें 5 जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई थीं।



