
गाजियाबाद। हाल ही में शहर-शहर गणेशोत्सव की धूम रही। मुख्यत: महाराष्टÑ, गोवा, गुजरात के साथ ही दक्षिण भारत में मनाया जाने वाला यह त्यौहार अब उत्तर भारत में भी बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। न केवल मेट्रो सिटी अपितुु टियर टू शहरों में श्रद्धालु प्रथम पूज्य भगवान गणेश की भक्ति में डूबे रहे और दस दिन तक गणपति बप्पा मोरया का गुणगान करते हुए गणेश प्रतिमाओं को नदियों, तालाबों और कुंडों में विसर्जित किया, लेकिन कतिपय विद्वानों ने उत्तर भारत में ‘श्रीगणेश की विदाई’ पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए इसे लोगों की अज्ञानता से जोड़ा है। उनका तर्क है कि गणेश जी तो ‘उत्तर भारत के राजा’ हैं, यहां से उनकी विदाई की परम्परा अतार्किक है।
उनकी दलील है कि गणेश जी अपने भाई कार्तिकेय से भेंट करने दक्षिण गए थे। वहां उनका स्वागत करना और दस दिन के प्रवास के बाद विदा करना तो समझ में आता है, लेकिन उत्तर भारत से उन्हें विदाई अतार्किक है।
सूचना प्रौद्योगिकी और तकनीक के निरंतर विकास के इस दौर में भौगोलिक दूरियां बहुत सिमट गई हैं, किसी एक भूभाग की संस्कृति को दूरस्थ भूभाग में अपनाया जाना सहज लगता है। गणेशोत्सव मुख्यत: दक्षिणी राज्यों में, दुर्गा पूजा बंगाल में, लोहड़ी-वैशाखी पंजाब में, होली-दशहरा-दीवाली हिन्दी प्रदेशों में मनाये जाते थे, लेकिन अब सारे त्योहार देश के बड़े हिस्से में मनाये जाने लगे हैं।
उत्तर भारत में गणेशोत्सव पर गणेश प्रतिमा स्थापना और विसर्जन पर विद्वानों का कहना है कि गणेश जी को प्रथम पूज्य और गणाधिपति बना देने पर रुष्ट होकर कार्तिकेय जी दक्षिण में विंध्याचल पर्वत पर निवास करने लगे थे। दक्षिण में कार्तिकेय जी की बहुत मान्यता भी है। जब गणेश जी भाई कार्तिकेय से मिलने दक्षिण गए तो वहां के लोगों ने उनके स्वागत में उत्सव मनाया और ि’अगले बरस तू जल्दी आ’ कहकर विदाई दी। इसी कारण दक्षिण राज्यों में गणेशोत्सव पर उनकी प्रतिमा स्थापना और मूर्ति विसर्जन किया जाता है, लेकिन उत्तर भारत में जहां भगवान गणेश निवास करते हैं, मूर्ति विसर्जन कर उन्हें विदा करना धार्मिक दृष्टिकोण से उचित नहीं है।



