
दीपक त्यागी संवाददाता
मेरठ। कैंसर के इलाज में पिछले कुछ वर्षों में क्रांतिकारी बदलाव आया है। पारंपरिक रेडिएशन थेरेपी, जो कभी व्यापक और जोखिम भरी मानी जाती थी, अब हाई-प्रिसिशन और मरीज-केंद्रित हो चुकी है। आधुनिक तकनीकों ने इसे पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित, सटीक और प्रभावी बना दिया है, जिससे मरीजों को न केवल बेहतर इलाज मिल रहा है, बल्कि उनकी जिंदगी भी सामान्य हो रही है।इंटेंसिटी मॉड्यूलेटेड रेडिएशन थेरेपी (IMRT) और इमेज गाइडेड रेडिएशन थेरेपी (IGRT) जैसी एडवांस तकनीकों ने रेडिएशन बीम को ट्यूमर के सटीक आकार, आकृति और स्थिति के अनुरूप ढाल दिया है। इससे स्वस्थ ऊतकों को न्यूनतम नुकसान पहुंचता है और साइड इफेक्ट्स जैसे थकान, त्वचा जलन या अंग क्षति में 30-50% तक कमी आती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह ब्रेन ट्यूमर, स्पाइनल कॉर्ड कैंसर, फेफड़ों और प्रोस्टेट कैंसर जैसे संवेदनशील मामलों में चमत्कारिक साबित हो रही है। उदाहरणस्वरूप, IGRT रीयल-टाइम इमेजिंग से ट्यूमर की हलचल को ट्रैक करती है, जिससे सटीकता 99% तक पहुंच जाती है।रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. अभिषेक गुलिया बताते हैं, “स्टीरियोटैक्टिक बॉडी रेडिएशन थेरेपी (SBRT) और स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी (SRS) ने इलाज की अवधि को अभूतपूर्व रूप से कम कर दिया है। जहां पहले 6-8 हफ्तों का कोर्स जरूरी था, वहीं अब प्रारंभिक स्टेज के कैंसर में मात्र 1 से 5 सेशंस पर्याप्त हैं। इससे मरीजों की रिकवरी तेज होती है, काम पर वापसी आसान हो जाती है और जीवन की गुणवत्ता में सुधार आता है।”मेरठ के प्रमुख कैंसर सेंटरों में ये तकनीकें उपलब्ध हैं, जिससे ग्रामीण मरीजों को दिल्ली-मुंबई न जाना पड़े। राष्ट्रीय कैंसर रजिस्टर के आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष 14 लाख नए कैंसर केस आते हैं, और हाई-प्रिसिशन थेरेपी से 20-30% अधिक उत्तरजीविता दर हासिल हो रही है। डॉ. गुलिया ने आगाह किया कि शुरुआती जांच ही सफल इलाज की कुंजी है। आज यह तकनीक कैंसर पीड़ितों को नई उम्मीद का संचार कर रही है।



