गंग नहर पटरी पर आग का तांडव: अधिकारियों की लापरवाही से पर्यावरण को लग रहा चोट, सफाई फंड का कहां हो रहा दुरुपयोग ?

दीपक त्यागी
मुरादनगर/ संवाददाता। गंग नहर की पटरी पर दिसंबर से मार्च तक आग लगाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। झाड़ियां और पेड़ साफ करने के नाम पर जलाई जा रही आग न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि नहर विभाग के अधिकारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। नहर पटरी के दोनों ओर फैले कचरे और वनस्पति को जलाने का यह तरीका न केवल खतरनाक है, बल्कि विभागीय फंड के दुरुपयोग का भी स्पष्ट उदाहरण है। मुरादनगर से खतौली तक इस समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है, लेकिन अधिकारी मौन साधे हुए हैं।

समस्या का उदय – सर्दियों में आग का खेल
हर साल दिसंबर से मार्च तक गंग नहर पटरी पर आग लगाने की घटनाएं चरम पर पहुंच जाती हैं। स्थानीय किसान और ग्रामीण बताते हैं कि नहर के दोनों किनारों पर उगी झाड़ियां, सूखी घास और कचरा साफ करने के नाम पर आग लगा दी जाती है। इससे न केवल धुआं और प्रदूषण फैलता है, बल्कि आसपास के खेतों और आवासीय इलाकों तक खतरा पहुंच जाता है। मुरादनगर के पास नहर पटरी पर हाल ही में लगी आग ने कई एकड़ वनस्पति को राख कर दिया। ग्रामीणों का कहना है कि यह आग विभागीय कर्मचारियों द्वारा ही लगाई जाती है, जो सफाई के नाम पर आसान रास्ता अपनाते हैं। खतौली क्षेत्र में भी यही हाल है, जहां पटरी पर जमा कचड़ा जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ जाता है।
फंड का रहस्यमय दुरुपयोग – सफाई का पैसा जाता कहां?
नहर विभाग को सफाई और रखरखाव के लिए केंद्र और राज्य सरकार से पर्याप्त फंड मिलता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि यह पैसा कहां जा रहा है? मशीनरी, मजदूर और वैज्ञानिक सफाई के तरीकों का इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा? इसके बजाय आग लगाकर सब कुछ राख करने का पुराना तरीका अपनाया जा रहा है। स्थानीय निवासी रामकिशोर सिंह ने कहा, “विभाग को हर साल करोड़ों रुपये मिलते हैं, लेकिन पटरी पर कचरा जमा ही रहता है। आग लगाकर वे सफाई का बहाना बनाते हैं।” खतौली के पूर्व सरपंच ओमप्रकाश ने भी आरोप लगाया कि फंड का एक बड़ा हिस्सा कागजों पर ही खर्च दिखाया जाता है।

दोहरी जिम्मेदारी – ‘सामाजिक तत्वों’ का बहाना
विभाग के अधिकारी आग लगाने के लिए ‘सामाजिक तत्वों’ को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका दावा है कि असामाजिक तत्व झाड़ियों में आग लगा देते हैं। लेकिन यह बहाना कितना सही है? किसानों की पराली जलाने की घटनाओं को सैटेलाइट से ट्रैक किया जाता है, निगरानी होती है और कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाती है। फिर नहर पटरी पर लगने वाली आग को सैटेलाइट से क्यों नहीं पकड़ा जाता? क्यों विभागीय कर्मचारी मौके पर तैनात नहीं होते? मुरादनगर के एक किसान ने सवाल उठाया, “पराली पर तो ड्रोन और सैटेलाइट से नजर रखी जाती है, लेकिन यहां आग लगने पर चुप्पी क्यों? क्या यह विभाग की मिलीभगत नहीं?” विशेषज्ञों का मानना है कि सैटेलाइट इमेजरी से इन आग की घटनाओं को आसानी से ट्रैक किया जा सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा।
पर्यावरण पर असर और अधिकारियों का मौन
इस आग से मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है, जैव विविधता नष्ट हो रही है और वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। सर्दियों में पहले से ही खराब हवा की गुणवत्ता पर यह अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। मुरादनगर से खतौली तक सैकड़ों किलोमीटर पटरी प्रभावित है। लेकिन नहर विभाग के अधिकारी चुप हैं। जब पत्रकारों ने संपर्क किया तो कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। उच्च अधिकारियों ने कहा कि “जांच की जाएगी”, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं दिख रही। पर्यावरणविदों ने मांग की है कि सैटेलाइट निगरानी शुरू हो और फंड के उपयोग पर ऑडिट हो।
समाधान की मांग – तत्काल कार्रवाई जरूरी
इस समस्या का समाधान मशीनरी से सफाई, नियमित पेट्रोलिंग और सैटेलाइट मॉनिटरिंग में है। ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से शिकायत की है और विभागीय अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है। यदि जल्द कदम नहीं उठे तो पर्यावरणीय क्षति और बढ़ेगी। नहर पटरी को हरा-भरा रखना विभाग की जिम्मेदारी है, न कि आग से राख करना।

दीपक त्यागी/ संवाददाता
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