
अब्दुल वाहिद / बागपत संवाददाता
बागपत
रालोद ने जब से पाला बदला है एवं भाजपा पार्टी मे पहुंच गए है तो जनपद मे किसान मसीहा बाबा महेंद्र सिंह टिकैत की याद तक नही आती है। और अब स्थिति यहां तक है कि पुण्यतिथि पर बाबा महेंद्र सिंह टिकैत को पुष्पांजलि अर्पित करने के लिए रालोद की तरफ से कोई कार्यक्रम तक नही किया गया।
विधानसभा चुनाव 2022 मे रालोद का सपा के साथ गठबंधन था। और वही भाकियू का पूरा साथ रालोद को मिला था। एवं रालोद के अधिकतर मंचो पर भाकियू नेता दिखाई देते थे। तो वही भाकियू के कार्यक्रमो मे रालोद नेता भी पीछे नही रहते थे। गन्ने का दाम बढ़वाने समेत अन्य को लेकर आंदोलन हुआ तो भाकियू व रालोद ने कई बार मिलकर किया। किसान मसीहा बाबा महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि पर उनको पुष्पांजलि नेता मिलकर देते रहे।
लोकसभा चुनाव 2024 मे रालोद ने पाला बदला और सपा का साथ छोड़कर भाजपा के साथ आ गया। उसके बाद से भाकियू का प्रेम भी कम होता चला गया। और किसान मसीहा बाबा महेंद्र सिंह टिकैत को वह भूलने लगे। और अब स्थिति यह हो गई है कि शुक्रवार को बाबा महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि थी। एवं रालोद द्वारा एक भी जगह कार्यक्रम करके उनको पुष्पांजलि तक अर्पित नही की गई। इसको लेकर नेताओ मे काफी चर्चा चल रही है। चार सौ शब्दों की समाचारपत्र के लिए खबर तैयार करें
न्यूज़बात, बागपत — रालोद के भाजपा से जुड़ने के बाद किसानों के हक़ के संघर्ष के प्रतीक बाबा महेंद्र सिंह टिकैत की याद फीकी पड़ती जा रही है। शुक्रवार को बाबा टिकैत की पुण्यतिथि के मौके पर बागपत जिले में रालोद की ओर से न तो कोई आयोजन किया गया और न ही कहीं पुष्पांजलि दी गई, जिससे राजनीतिक गलियारे व स्थानीय जनमानस में चर्चाओं का माहौल बन गया है।
विधानसभा चुनाव 2022 में रालोद ने सपा के साथ गठबंधन किया था और उस दौरान भाकियू का पूरा साथ मिला था। उस समय रालोद के मंचों पर भाकियू के कई नेता दिखाई देते थे और भाकियू के कार्यक्रमों में रालोद के नेता पीछे नहीं रहते थे। गन्ने का दाम बढ़वाने और अन्य किसानों से जुड़े मसलों पर दोनों संगठन कई बार मिलकर आंदोलन करते रहे और ऐसी ही भागीदारी के चलते किसान नेता बाबा टिकैत की पुण्यतिथि पर दोनों ओर से संयुक्त रूप से श्रद्धांजलि देखी जाती थी।
लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 के बाद राजनीतिक समीकरणों में बदलाव आया और रालोद ने सपा का साथ छोड़कर भाजपा के साथ हाथ मिला लिया। उस बदलाव के बाद भाकियू व रालोद के बीच निकटता में कमी आई और स्थानीय मामलों में पहले जैसी आपसी तालमेल कम होते चली गई। अब उस दूरी का असर बाबा टिकैत की पुण्यतिथि पर साफ नजर आया, जब रालोद की ओर से कोई सार्वजनिक श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया। स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह परिवर्तन संगठन के रुख और प्राथमिकताओं के बदलने का परिणाम है।
किसान नेताओं और समाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस बारे में तरह-तरह की प्रतिक्रिया दी। कुछ ने कहा कि राजनीतिक मंचों पर बदलाव के बावजूद किसानों व उनके नेताओं का सम्मान कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए। वहीं कुछ रालोद कार्यकर्ता मानते हैं कि पार्टी के नए गठजोड़ व व्यस्तता के चलते ऐसे आयोजनों पर ध्यान नहीं दिया गया। स्थानीय नागरिकों व सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर नाराजगी और आश्चर्य दोनों देखने को मिले।
भाकियू के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि वे हर साल की तरह अपनी ओर से श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं और बाबा टिकैत के आदर्शों को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास जारी रखेंगे। वहीं रालोद नेतृत्व से संपर्क करने पर स्पष्ट टिप्पणी नहीं मिल सकी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि क्षेत्रीय राजनीतिक रिश्तों में आए बदलावों का असर सामाजिक परम्पराओं और सामूहिक आयोजनों पर भी दिखता है, और यह मामला उसी का उदाहरण माना जा सकता है।
बागपत में अब यह विषय गर्म चर्चाओं में है और आने वाले दिनों में राजनीतिक दलों की रणनीतियों व स्थानीय शक्ति समीकरणों पर इसका असर देखा जाएगा।



