
हिमालय को अक्सर “एशिया का जल मीनार” कहा जाता है, क्योंकि यह लगभग दो अरब लोगों को पानी प्रदान करने वाली प्रमुख नदियों (गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र आदि) का स्रोत है। ग्लेशियरों के पिघलने की गति बढ़ने के कई गंभीर परिणाम हैं:
- विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन:
- पिघले हुए पानी से हिमनद झीलें (Glacial Lakes) तेज़ी से बन रही हैं और उनका आकार बढ़ रहा है।
- इन अस्थिर झीलों के अचानक फटने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (GLOF) जैसी विनाशकारी बाढ़ें आ सकती हैं। सिक्किम की ल्होनक झील फटने की घटना इसका एक उदाहरण है।
- ग्लेशियरों के पिघलने से पहाड़ अस्थिर हो जाते हैं, जिससे भूस्खलन का खतरा भी बढ़ता है।
- जल संकट (दीर्घकालिक खतरा):
- शुरुआत में, पिघलने की बढ़ी हुई दर से नदियों में पानी का प्रवाह बढ़ जाता है, लेकिन यह स्थिति अस्थायी है।
- दीर्घकाल में, जब ग्लेशियर सिकुड़ जाएंगे या गायब हो जाएंगे, तो बर्फ के इन प्राकृतिक भंडारों पर निर्भर जलस्रोत सूख जाएंगे। इससे उन समुदायों के लिए पानी की गंभीर कमी हो जाएगी जो कृषि (सिंचाई), पेयजल और जलविद्युत के लिए इन नदियों पर निर्भर हैं।
- जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र पर असर:
- बढ़ते तापमान और पानी के बदलते पैटर्न से हिमालयी क्षेत्र की विशिष्ट जैव विविधता प्रभावित हो रही है।
- बर्फ पर निर्भर रहने वाले कई जीव और वनस्पतियों का आवास खतरे में पड़ जाएगा, जिससे अद्वितीय वनस्पतियों और जीवों का नुकसान हो सकता है।
- पिघलने से निकलने वाले पानी में सीसा (Lead) जैसे भारी धातुओं के घुलने का भी खतरा है, जो जल प्रदूषण को बढ़ाकर लाखों लोगों को गंभीर बीमारियों का शिकार बना सकता है।
- समुद्र के स्तर में वृद्धि:
- हालांकि हिमालयी ग्लेशियरों की मात्रा अंटार्कटिका या ग्रीनलैंड की तुलना में कम है, लेकिन इनका पिघलना वैश्विक समुद्र के स्तर को बढ़ाने में योगदान देता है।
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि पश्चिमी हिमालय के ग्लेशियरों में $70\%$ तक की कमी आई है, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी का संकट पैदा हो सकता है। इस समस्या के समाधान के लिए एकीकृत हिमालयी कार्य योजना और सतत निगरानी तंत्र की तत्काल आवश्यकता है



