
गाजियाबाद के गुलधर स्थित आरटीओ कार्यालय में अत्याधुनिक संसर-आधारित ऑटोमेटेड ड्राइविंग टेस्ट ट्रैक के लागू होने के बाद स्थायी ड्राइविंग लाइसेंस (DL) प्राप्त करना अब टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। पहले जहाँ मानवीय हस्तक्षेप के कारण टेस्ट पास करना तुलनात्मक रूप से आसान था, वहीं अब पूरी प्रक्रिया कंप्यूटर और सेंसर द्वारा नियंत्रित है। आज की रिपोर्ट के अनुसार, इस नई व्यवस्था के चलते आवेदकों की सफलता दर में भारी गिरावट आई है। पिछले पूरे महीने में हजारों आवेदकों में से मात्र 60 लोग ही इस कठिन परीक्षा को सफलतापूर्वक पास कर स्थायी लाइसेंस हासिल कर सके हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि अब केवल वही लोग सड़क पर वाहन चलाने के पात्र होंगे जो तकनीकी रूप से पूरी तरह दक्ष हैं।
इस ऑटोमेटेड ट्रैक की बनावट काफी जटिल है, जिसमें ‘8’ आकार का ट्रैक, समानांतर पार्किंग (Parallel Parking) और रिवर्स ड्राइविंग जैसे कठिन पड़ाव शामिल हैं। पूरे ट्रैक पर जगह-जगह सेंसर और सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं, जो वाहन के पहिये की एक छोटी सी गलती या सीमा रेखा (Boundary) को छूने पर तुरंत सिग्नल भेज देते हैं। जैसे ही कोई आवेदक गलती करता है, कंप्यूटर उसे स्वचालित रूप से ‘फेल’ घोषित कर देता है, जिससे आरटीओ अधिकारियों के पास भी परिणाम बदलने की कोई गुंजाइश नहीं रहती। इस पारदर्शी लेकिन सख्त व्यवस्था ने बिचौलियों के खेल को पूरी तरह खत्म कर दिया है, लेकिन साथ ही उन लोगों के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है जो बिना पर्याप्त अभ्यास के टेस्ट देने पहुँच रहे हैं।
परिवहन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस सख्ती का मुख्य उद्देश्य सड़क सुरक्षा को बढ़ावा देना और अकुशल चालकों को लाइसेंस जारी होने से रोकना है। सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने के लिए यह अनिवार्य है कि चालक को वाहन पर पूर्ण नियंत्रण हो। वर्तमान में आवेदकों के फेल होने का सबसे बड़ा कारण रिवर्स गियर और पार्किंग के दौरान सेंसर का सक्रिय होना पाया गया है। विभाग अब आवेदकों को सलाह दे रहा है कि वे टेस्ट देने से पहले पेशेवर ड्राइविंग स्कूलों में पर्याप्त अभ्यास करें। हालांकि वर्तमान में पास होने वालों की संख्या बहुत कम है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में इससे सड़क अनुशासन में सुधार होगा और केवल योग्य चालक ही गाजियाबाद की सड़कों पर दिखाई देंगे।



