
आज 13 जनवरी 2026 को माघ मास की कालाष्टमी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाई जा रही है। हिंदू धर्म में काल भैरव को शिव का पांचवां अवतार और ‘समय का अधिपति’ माना गया है। मान्यताओं के अनुसार, कालाष्टमी के दिन ही भगवान शिव के अंश से काल भैरव प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन उनकी पूजा का विशेष फल मिलता है। आज के दिन भक्त व्रत रखते हैं और अर्धरात्रि के समय काल भैरव की विशेष आरती और चालीसा का पाठ करते हैं। काशी (वाराणसी) सहित देशभर के भैरव मंदिरों में सुबह से ही भक्तों का तांता लगा हुआ है, जहाँ उन्हें ‘काशी का कोतवाल’ मानकर सुख-शांति और संकटों से मुक्ति की प्रार्थना की जा रही है।
ज्योतिष शास्त्र और तंत्र साधना की दृष्टि से कालाष्टमी का दिन अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। इस दिन काल भैरव की पूजा करने से कुंडली में स्थित राहु, केतु और शनि जैसे क्रूर ग्रहों के अशुभ प्रभाव शांत होते हैं। विशेष रूप से वे लोग जो शत्रु बाधा, कोर्ट-कचहरी के मामलों या अज्ञात भय से ग्रसित हैं, उनके लिए आज के दिन भैरव मंत्रों का जाप करना अचूक माना गया है। भैरव जी का वाहन कुत्ता (श्वान) है, इसलिए इस दिन काले कुत्ते को रोटी या मीठा खिलाना विशेष पुण्यदायी माना जाता है। तांत्रिक साधना करने वाले साधक आज की रात को ‘सिद्धि की रात’ मानते हैं और श्मशान या एकांत स्थानों पर गुप्त पूजा अर्चना करते हैं।
कालाष्टमी के व्रत का पालन करने से साधक को नकारात्मक ऊर्जा और बुरी शक्तियों से सुरक्षा प्राप्त होती है। इस दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है; विशेषकर तिल का तेल, उड़द की दाल और मदिरा (प्रतीकात्मक रूप से) अर्पित करने की परंपरा है। जो लोग पूर्ण व्रत नहीं रख सकते, वे आज सात्विक भोजन ग्रहण करते हुए तामसिक प्रवृत्तियों से दूर रहने का संकल्प लेते हैं। मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त निष्काम भाव से काल भैरव की शरण में जाता है, उसके जीवन से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है और समय उसके अनुकूल चलने लगता है। शाम के समय भैरव मंदिरों में सरसों के तेल का दीपक जलाने से घर की नकारात्मकता दूर होती है और आरोग्य की प्राप्ति होती है।



