
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में शराबबंदी कानून (Bihar Prohibition and Excise Act) के तहत बड़ी संख्या में लोगों की गिरफ्तारी और राज्य की अदालतों पर बढ़ते बोझ को लेकर बिहार सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने इस कानून के दुरुपयोग और इसके कारण न्यायिक प्रणाली पर पड़ रहे असाधारण दबाव पर गहरी चिंता व्यक्त की है। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार से सीधा सवाल किया कि इस कानून के तहत जेलों में बंद सभी आरोपितों को जमानत क्यों नहीं दे दी जानी चाहिए, क्योंकि कानून के प्रावधान अत्यधिक कठोर हैं और यह सामान्य जमानत प्रक्रिया को बाधित कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह कानून राज्य की अदालतों को जमानत याचिकाओं की बाढ़ में डुबो रहा है, जिससे अन्य गंभीर आपराधिक और दीवानी मामलों की सुनवाई प्रभावित हो रही है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शराबबंदी लागू करने का तरीका ऐसा नहीं होना चाहिए कि वह राज्य की न्यायिक अवसंरचना को ही चरमरा दे। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि वह इस समस्या के समाधान के लिए क्या कदम उठा रही है और क्या कानून के प्रावधानों में समीक्षा की कोई योजना है। कोर्ट ने आगे कहा कि शराबबंदी के तहत दर्ज मामलों की इतनी बड़ी संख्या से पता चलता है कि यह कानून अपने उद्देश्य को पूरी तरह से प्राप्त करने में सफल नहीं रहा है। शीर्ष अदालत ने बिहार सरकार को इस संबंध में एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें बताया जाए कि इस कानून के तहत कितने लोग जेलों में बंद हैं, कितने मामलों का निस्तारण हुआ है और न्यायिक बोझ को कम करने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं। कोर्ट की यह फटकार राज्य में शराबबंदी कानून के व्यावहारिक कार्यान्वयन पर एक महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी है, जो मानवाधिकारों और न्यायिक दक्षता के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता को उजागर करती है। यह मामला दर्शाता है कि कैसे एक सामाजिक नीति, जब सख्ती से लागू की जाती है, तो कानूनी और प्रशासनिक जटिलताएं पैदा कर सकती है।



