
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। कल रविवार को चुनावी मैदान में उतरने वाले सभी दलों के खिलाड़ी अपनी-अपनी मुहिम पर रहे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां कानून-व्यवस्था और सरकार की उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच पहुंच बढ़ा रहे हैं, वहीं भाजपा ने संगठन स्तर पर बड़े बदलाव करते हुए 98 जिलों के प्रभारियों की घोषणा की है। समाजवादी पार्टी भी चुनावी रणनीति को धार देने में जुटी है। उधर ओवैसी की प्रस्तावित जनसभाओं ने राजनीतिक माहौल में गहमागहमी बढ़ा दी है।
भाजपा की नई सूची में पुराने और अनुभवी चेहरों के साथ अलग-अलग सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश दिखाई देती है। 98 जिला प्रभारियों में 29 ब्राह्मण, 25 ओबीसी, 18 ठाकुर, 13 बनिया और पांच दलित समाज से जुड़े नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है। सूची में चार महिला पदाधिकारी भी शामिल हैं। चुनाव से पहले इसे संगठन को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
उधर, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में 2027 के चुनाव को लेकर पार्टी की रणनीति पर चर्चा की। उन्होंने भाजपा के वोट में 27 हजार की कमी और सपा के वोट में 27 हजार की बढ़ोतरी का लक्ष्य सामने रखा। हालांकि, यह पार्टी की राजनीतिक रणनीति और लक्ष्य है, न कि स्वतंत्र चुनावी आकलन।
अखिलेश यादव ने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण पर भी जोर दिया। उन्होंने भाजपा सरकार पर डॉ. भीमराव आंबेडकर से जुड़े स्मारकों और प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचाए जाने का आरोप लगाया। ऐसे आरोपों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद रहे हैं और इन्हें संबंधित दलों के बयानों के रूप में देखा जाना चाहिए।
इसी बीच एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित जनसभाओं ने भी सियासी चर्चा बढ़ा दी है। कानपुर के बाद श्रावस्ती और आजमगढ़ में उनके कार्यक्रम प्रस्तावित बताए जा रहे हैं। ओवैसी की सक्रियता का असर खासकर उन क्षेत्रों में राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या महत्वपूर्ण है। हालांकि, इसका चुनावी प्रभाव अभी किसी निश्चित निष्कर्ष के रूप में नहीं बताया जा सकता।
रायबरेली में भाजपा ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे नीरज सिंह को जिला प्रभारी की जिम्मेदारी दी है। रायबरेली लोकसभा सीट कांग्रेस नेता राहुल गांधी से जुड़ी प्रमुख राजनीतिक सीटों में रही है। ऐसे में भाजपा के इस संगठनात्मक फैसले को 2027 से पहले अपनी जमीनी तैयारी मजबूत करने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में भाजपा, सपा और अन्य दलों ने संगठन, सामाजिक समीकरण और मतदाता संपर्क को लेकर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। 2027 के चुनाव से पहले आने वाले महीनों में इन रणनीतियों और उनके राजनीतिक प्रभाव पर नजर रहेगी।



