
उत्तर भारत, विशेष रूप से गंगा के मैदानी क्षेत्र (Gangetic Plains) में कोहरे की घटनाओं के बढ़ने के पीछे मुख्य वैज्ञानिक कारण निम्नलिखित हैं:
- कण पदार्थ (Particulate Matter) की भूमिका:
- वाहनों के उत्सर्जन, औद्योगिक गतिविधियों, पराली जलाने और निर्माण कार्यों से बड़ी मात्रा में सूक्ष्म कण जैसे PM2.5 और PM10 हवा में जमा होते हैं।
- ये प्रदूषक कण आर्द्रताग्राही नाभिक (Hygroscopic Nuclei) का काम करते हैं। सामान्य कोहरा जल वाष्प के संघनन (Condensation) से बनता है, जिसके लिए हवा में प्राकृतिक रूप से मौजूद धूल के कणों का इस्तेमाल होता है।
- प्रदूषण के कारण हवा में इन नाभिकों की संख्या अत्यधिक बढ़ जाती है। ये कण नमी (जल वाष्प) को अपनी ओर खींचते हैं और तेज़ी से संघनित होकर पानी की सूक्ष्म बूँदें बनाते हैं, जिससे घने कोहरे (यानी स्मॉग) का निर्माण होता है।
- हवा की गति और इन्वर्जन (Inversion):
- सर्दियों के दौरान ठंडी हवा के कारण हवा की गति कम हो जाती है।
- तापमान इन्वर्जन (Temperature Inversion) की स्थिति बनती है, जहाँ ठंडी हवा की एक परत ज़मीन के पास फंस जाती है और ऊपर की गर्म हवा एक “ढक्कन” की तरह काम करती है।
- इससे स्थानीय प्रदूषक और नमी ऊपरी वायुमंडल में नहीं जा पाते और नीचे ही जमा होते रहते हैं, जिससे कोहरा घना और लंबे समय तक बना रहता है।
- स्थिर भौगोलिक स्थिति: गंगा का मैदानी क्षेत्र उत्तर में हिमालय और दक्षिण में विंध्य श्रेणी के बीच एक विशाल घाटी की तरह है। यह भूमि-आबद्ध (Landlocked) होने के कारण यहाँ प्रदूषक तेज़ी से छितरा (Disperse) नहीं पाते हैं।
संक्षेप में, यह अब केवल ‘फॉग’ (Fog) नहीं, बल्कि ‘स्मॉग’ (Smog) है, जो धुएं (Smoke) और कोहरे (Fog) का एक खतरनाक मिश्रण है। यह सामान्य कोहरे की तुलना में स्वास्थ्य के लिए अधिक हानिकारक है और विजिबिलिटी को और भी कम कर देता है।



