
– मुरादनगर सीएचसी में एंटी स्नेक वेनम की कमी, एमएमजी अस्पताल किया गया रेफर
– अधिकारियों के रवैये और सीयूजी नंबरों की उपयोगिता पर भी उठे प्रश्न
मोदीनगर। संवाददाता
सावन माह की कांवड़ यात्रा के दौरान लाखों शिवभक्तों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन सोमवार को डिडौली स्थित कांवड़ शिविर में हुई एक घटना ने इन दावों की हकीकत पर सवाल खड़े कर दिए। शिवभक्त को सांप के डसने के बाद समय पर समुचित उपचार नहीं मिलने से उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाना पड़ा। इस घटना ने जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था और आपातकालीन तैयारियों की पोल खोल दी।
जानकारी के अनुसार, राजस्थान के कोटपुतली निवासी कांवड़िया लालचंद हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपने साथियों के साथ लौट रहा था। डिडौली स्थित कांवड़ शिविर में विश्राम के दौरान उसे अचानक सांप ने डस लिया। साथी कांवड़ियों और शिविर में मौजूद लोगों ने तत्काल उसे उपचार के लिए मुरादनगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया।
बताया जाता है कि मुरादनगर सीएचसी में सांप के काटने के इलाज के लिए आवश्यक एंटी स्नेक वेनम (एएसवी) इंजेक्शन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थे। प्राथमिक उपचार के बाद चिकित्सकों ने गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे गाजियाबाद के एमएमजी अस्पताल के लिए रेफर कर दिया लेकिन एमजी ने भी ज़ी टीवी के लिए रेफर कर दिया। ईस दौरान परिजन और साथी कांवड़ियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। उनका कहना था कि यदि समय पर सभी आवश्यक दवाएं उपलब्ध होतीं तो मरीज को दूसरे अस्पताल भेजने की जरूरत नहीं पड़ती।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि सांप के डसने जैसे मामलों में हर मिनट कीमती होता है। ऐसे में मरीज को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजना उसकी जान के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। कांवड़ यात्रा जैसे विशाल आयोजन में इस प्रकार की स्थिति स्वास्थ्य विभाग की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
स्थानीय लोगों और शिविर संचालकों का कहना है कि कांवड़ मार्ग पर लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही को देखते हुए प्रत्येक प्रमुख चिकित्सा केंद्र और अस्थायी स्वास्थ्य शिविर में पर्याप्त मात्रा में एंटी स्नेक वेनम, आपातकालीन दवाएं और प्रशिक्षित चिकित्सक उपलब्ध होने चाहिए। उनका आरोप है कि कई शिविरों में डॉक्टरों की संख्या भी आवश्यकता के अनुरूप नहीं है, जिसके कारण गंभीर मरीजों को तत्काल विशेषज्ञ उपचार नहीं मिल पाता।
कांवड़ यात्रा के दौरान प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की ओर से लगातार यह दावा किया जा रहा है कि श्रद्धालुओं के लिए व्यापक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। विभिन्न स्थानों पर मेडिकल कैंप, एंबुलेंस और चिकित्सकों की तैनाती की बात कही गई है। हालांकि डिडौली की घटना के बाद इन व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं।
घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनका फोन नहीं उठा। बाद में जब संबंधित अधिकारी से मुलाकात की गई तो उन्होंने कथित कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया तौर
जिले के एक अधिकारी कहते हैं कि मैं कोई कॉल सेंटर नहीं खोल रखा:
“मैंने कोई कॉल सेंटर नहीं खोल रखा है कि हर किसी का फोन सुनूं।” अधिकारी की इस कथित टिप्पणी से लोगों में नाराजगी देखने को मिली। लोगों का कहना है कि जब अधिकारियों को जनता और मीडिया के फोन नहीं उठाने हैं तो फिर उन्हें सीयूजी नंबर उपलब्ध कराने का औचित्य क्या है।
सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सरकारी अधिकारी जनता की समस्याओं के समाधान के लिए नियुक्त किए जाते हैं। आपातकालीन परिस्थितियों में यदि संबंधित अधिकारी उपलब्ध नहीं होंगे तो आम लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ेगा। उनका कहना है कि विशेषकर कांवड़ यात्रा जैसे बड़े आयोजन के दौरान अधिकारियों की जवाबदेही और संवेदनशीलता दोनों जरूरी हैं।
कांवड़ मार्ग पर सेवा कर रहे स्वयंसेवकों का भी कहना है कि कई बार गंभीर मरीजों के उपचार के लिए संबंधित अधिकारियों या विभागों से संपर्क करना कठिन हो जाता है। उनका मानना है कि कंट्रोल रूम और हेल्पलाइन को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत समन्वय स्थापित किया जा सके।
स्थानीय लोगों ने मांग की है कि पूरे कांवड़ मार्ग पर स्वास्थ्य सुविधाओं की तत्काल समीक्षा कराई जाए। जिन अस्पतालों और चिकित्सा केंद्रों में आवश्यक जीवनरक्षक दवाओं की कमी है, वहां तुरंत उपलब्ध कराई जाए। साथ ही प्रत्येक प्रमुख शिविर पर विशेषज्ञ चिकित्सकों और पर्याप्त पैरामेडिकल स्टाफ की तैनाती सुनिश्चित की जाए, ताकि किसी भी गंभीर मरीज को इधर-उधर भटकना न पड़े।
लोगों का यह भी कहना है कि यदि स्वास्थ्य विभाग पहले से बेहतर तैयारी करता और सभी आवश्यक दवाएं उपलब्ध रहतीं तो सांप के डसने वाले कांवड़िये को रेफर करने की नौबत शायद नहीं आती। प्रशासन से यह भी मांग की गई है कि घटना की जांच कर यह पता लगाया जाए कि संबंधित अस्पताल में एंटी स्नेक वेनम की पर्याप्त उपलब्धता क्यों नहीं थी और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।
फिलहाल कांवड़िये का उपचार ज़ी टीवी अस्पताल में चल रहा है। वहीं, इस घटना के बाद जिले की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। स्वास्थ्य विभाग का पक्ष सामने आने का इंतजार है।



