
वर्तमान भारतीय राजनीति का परिदृश्य अनेक गंभीर प्रश्न खड़े करता है। लोकतंत्र का उद्देश्य समाज को जोड़ना, नागरिकों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना और राष्ट्र को विकास की दिशा में आगे बढ़ाना होता है, किंतु आज की परिस्थितियाँ चिंता उत्पन्न करती हैं। राजनीति का केंद्र राष्ट्रहित से हटकर जातीय और साम्प्रदायिक समीकरणों पर अधिक आधारित दिखाई देता है। चुनाव आते ही विकास, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं तथा जाति और धर्म वोट का सबसे बड़ा आधार बन जाते हैं। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की आत्मा के लिए घातक है।
जाति और सम्प्रदाय आधारित राजनीति
आज देश की राजनीति ने समाज को जातियों और सम्प्रदायों में बाँटने का कार्य किया है। चुनावों में उम्मीदवारों और दलों का मूल्यांकन उनके कार्यों के आधार पर कम तथा जातीय और धार्मिक पहचान के आधार पर अधिक होने लगा है। इससे सामाजिक समरसता कमजोर हुई है और राष्ट्रीय एकता को चुनौती मिली है। राजनीति का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, विभाजित करना नहीं।
जनता के मूल मुद्दों की उपेक्षा
राजनीतिक दलों ने बड़ी चतुराई से जनता के वास्तविक मुद्दों को चुनावी विमर्श से लगभग बाहर कर दिया है। आम नागरिक महँगाई, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, न्याय व्यवस्था, पर्यावरण, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, परंतु चुनावी मंचों पर इन विषयों पर गंभीर चर्चा बहुत कम दिखाई देती है। घोषणापत्रों में इनका उल्लेख अवश्य होता है, किंतु भाषणों और बहसों में भावनात्मक मुद्दे अधिक हावी रहते हैं।
भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अव्यवस्था
देश में भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अव्यवस्था और नौकरशाही की निरंकुशता निरंतर बढ़ती दिखाई दे रही है। जनप्रतिनिधियों के ऐशोआराम, सत्ता के दुरुपयोग और अनैतिक आचरण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं दिखाई देता। शासन व्यवस्था का उद्देश्य जनसेवा होना चाहिए, किंतु कई बार राजनीति व्यक्तिगत लाभ और सत्ता संरक्षण का माध्यम बनती प्रतीत होती है। इससे आम नागरिक का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास कमजोर होता है।
मीडिया की गैर-जिम्मेदार भूमिका
मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चैथा स्तंभ कहा जाता है, उसकी भूमिका भी आज प्रश्नों के घेरे में है। निष्पक्ष पत्रकारिता के स्थान पर सनसनी, टीआरपी और व्यावसायिक हितों को अधिक महत्व दिया जा रहा है। कई बार अधूरी या भ्रामक सूचनाएँ समाज में भ्रम और तनाव पैदा करती हैं। मीडिया का दायित्व समाज को सही दिशा देना और सत्य को सामने लाना है, किंतु जब वही पक्षपात और व्यावसायिक लालच का शिकार हो जाए तो लोकतंत्र कमजोर पड़ने लगता है।
न्यायपालिका और सरकार के बीच टकराव
लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन अत्यंत आवश्यक है। आज न्यायपालिका और सरकार के बीच प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष टकराव कई बार स्पष्ट दिखाई देता है। इससे प्रशासनिक अराजकता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। संविधान की मर्यादा और संस्थागत संतुलन बनाए रखना राष्ट्रहित में आवश्यक है।
अयोग्य नेतृत्व और व्यवस्था का संकट
आज कई महत्वपूर्ण राजनीतिक और संवैधानिक पदों पर अनुभवहीन अथवा अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्ति देखने को मिलती है। इससे प्रशासनिक दक्षता प्रभावित होती है और समाज में निराशा का वातावरण बनता है। योग्यता, ईमानदारी और राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए, तभी व्यवस्था में सुधार संभव है।
महँगी चुनाव प्रक्रिया और लोकतंत्र का संकट
चुनावी प्रक्रिया इतनी महँगी हो चुकी है कि एक ईमानदार, योग्य, निष्पक्ष और स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए चुनाव लड़ना कठिन होता जा रहा है। राजनीति में धनबल और बाहुबल का प्रभाव बढ़ने से लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप प्रभावित हुआ है। यदि राजनीति में केवल आर्थिक रूप से शक्तिशाली लोग ही प्रवेश कर पाएँगे, तो सामान्य और प्रतिभाशाली नागरिकों की भागीदारी सीमित हो जाएगी।
सामाजिक विभाजन और भविष्य की आशंका
इन परिस्थितियों को देखकर यह आशंका उत्पन्न होती है कि कहीं समाज एक नए वर्ग संघर्ष की ओर तो नहीं बढ़ रहा। साम्प्रदायिक तनाव और सामाजिक विभाजन कई बार इतने स्पष्ट दिखाई देते हैं कि समाज दो धु्रवों में बंटता महसूस होता है। आर्थिक स्थिति भी चिंताजनक है। केंद्र और अधिकांश राज्य सरकारें भारी कर्ज के बोझ तले दबी हुई हैं। दूसरी ओर देश का युवा वर्ग भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहा है और बड़ी संख्या में युवा विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति-युवा वर्ग
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। वर्तमान में भारत में 15 से 30 वर्ष की आयु के लगभग 30 करोड़ युवा हैं। यह संख्या भारत को विश्व का सबसे युवा देश बनाती है। यदि इस ऊर्जा को सही दिशा मिले तो भारत विश्व की अग्रणी शक्ति बन सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, संस्कार और आत्मनिर्भरता प्रदान की जाए।
राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका
आज का सबसे बड़ा राष्ट्रीय दायित्व यही है कि समाज, सरकार और परिवार मिलकर युवाओं को सही दिशा दें। उनके भीतर राष्ट्रप्रेम, आत्मविश्वास और अपनी संस्कृति के प्रति गर्व की भावना विकसित की जाए। जब युवा अपने देश के लिए जीना और आवश्यकता पड़ने पर त्याग करना सीखेंगे, तभी भारत वास्तव में सशक्त, विकसित और विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा। समय की माँग है कि जातिगत और साम्प्रदायिक राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी जाए। यदि हमने समय रहते परिस्थितियों को नहीं सुधारा, तो भविष्य की चुनौतियाँ और अधिक गंभीर हो सकती हैं। राजनीति सेवा का माध्यम बने, समाज में समरसता बढ़े और राष्ट्र निर्माण सर्वोच्च लक्ष्य बने, यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
जय हिन्द!

डॉ. अशोक कुमार गदिया Z
(लेखक मेवाड़ ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन्स के चेयरमैन हैं।)



