
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हुए उनके जेल से सरकारी कामकाज संभालने के तरीके पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह हमला तब हुआ जब केजरीवाल को एक कानूनी मामले में न्यायिक हिरासत में भेजा गया, लेकिन उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया और दावा किया कि वह जेल से भी सरकार चला सकते हैं। इस संदर्भ में, भाजपा ने जोर देकर दिल्ली विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है ताकि सदन में यह स्पष्ट किया जा सके कि मुख्यमंत्री ने हिरासत में रहते हुए वास्तव में कितने सरकारी फैसले लिए हैं और उन फैसलों की कानूनी तथा प्रशासनिक वैधता क्या है। भाजपा का तर्क है कि एक संवैधानिक पद पर रहते हुए जेल से शासन करना प्रशासनिक विसंगति पैदा करता है और यह नैतिक रूप से अनुचित है, क्योंकि इससे सरकारी गोपनीयता और कामकाज की पारदर्शिता प्रभावित होती है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि यह मुद्दा केवल एक व्यक्ति की कानूनी स्थिति का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन के सिद्धांतों का है। उनका मानना है कि मुख्यमंत्री के फैसलों की सदन में समीक्षा होनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दिल्ली के लोगों के हित सुरक्षित हैं। विशेष सत्र बुलाने की मांग करके भाजपा दिल्ली की राजनीति में संवैधानिक संकट की धारणा को मजबूत करने की कोशिश कर रही है और केजरीवाल सरकार पर नैतिक दबाव बढ़ा रही है। यह मांग सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी (आप) के इस दावे को चुनौती देती है कि जेल से भी प्रभावी ढंग से शासन किया जा सकता है। भाजपा चाहती है कि केजरीवाल या तो पद छोड़ दें या सार्वजनिक रूप से अपने फैसलों की रक्षा करें, जिससे यह मुद्दा आगामी चुनावों में एक बड़ा चुनावी हथियार बन सके। विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग राजनीतिक विरोध को संस्थागत मंच पर ले जाने की भाजपा की एक सोची-समझी रणनीति है।



